परिकल्पना भारत के पुनर्निर्माण की

ग्यारहवीं – बारहवीं सदी का भारत, सम्पूर्ण निरोगी भारत, स्वावलंबी भारत, स्वाभिमानी और समृद्ध भारत को अरब देश के लूटेरों ने लूटने की जैसे श्रुंखला चला दी थी. कई लूटेरे तो प्रति वर्ष आते और लूट कर चले जाते. इसकी सूचना जब यूरोप में पहुंची तो इसाई धर्म सत्ता के लूटेरे ठेकेदारों ने भारत को लूटने की योजना बनाई. यह ठेका समुद्री लूटेरा वास्को – डी – गामा को मिली. वह धनाठ्य भारत की खोज में निकल पड़ा. समुद्री रास्ते से वह गोमान्तक (गोवा) के तट पर पहुंचा. जहाँ से उसे केरल में घूसने का भी रास्ता मिल गया. यह दोनों क्षेत्र स्वर्ण के लदा – भरा प्रदेश था.
बात यहीं समाप्त हो जाती तो कोई ज्यादा संकट नहीं था. लेकिन लूटेरा वास्को के मरने के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी कोलकाता आई. सूरत में पहला अड्डा बनाया. 150 वर्षों में सम्पूर्ण भारत पर काबिज हो गया. हमारे मंदिरों को कंगाल किया. जंगलों को रिज़र्व किया ताकि सागवान की सारी लकड़ियाँ ब्रिटेन जा सके. उन्ही दिनों से आज तक भारत में सागवान के पेड़ रिज़र्व है. जो पेड़ लगाएगा उसे कटाने का आज भी अधिकार नहीं है. आयरन ओर के खादानों को रिज़र्व किया गया. आज तक आयरन ओर के पहाड़ रिज़र्व हैं. खाद्यानों में कोयले के साथ हीरे निकलते थे. वह भी आज तक रिज़र्व है.
बात यहीं समाप्त हो जाती तो कोई ज्यादा संकट नहीं था. अंगरेजों ने हमारी संस्कृति को नष्ट करने के लिए बदनाम किया. भारत में कोई बीमार नहीं था इसलिए चिकित्सालय नहीं थे. हर गाँव में गुरुकुल था इसलिए स्कूल नहीं थे. गुरुकुलों को बंद कराया और गाँव के वैद्यों को जेल में डाला. उलटा बदनाम किया की भारत अनपढ़ और गवांर देश है. जबकि सत्य यह था की चोदहवीं सदी के ब्रिटेन को पता नहीं था की शिक्षा क्या होती है ? औषध क्या होती है ?
सब कुछ नष्ट क्या हुआ भारत आज धीरे – धीरे खड़ा हो रहा है. अपने ही देश में मीरजाफर और जयचंद जैसे लोगों के कारण आज भी वास्को – डी – गामा जैसे लूटेरों और इस्लामिक बलात्कारियों के नाम पर शहर ओर मार्ग हैं. मुगलों और अंगरेजों के जाने के बाद किसी ने इन सब को बदल डालने का साहस नहीं किया. इसलिए हम भारतीये होने के मूल तत्व से भटक कर भारत में ही यूरोप को खोज रहे हैं.
अगर यही चलता रहा तो आने वाली पीढियां हमारे चित्रों पर थूकेंगी क्योंकि हमने उनके लिए निरोगी, स्वावलंबी, स्वाभिमानी और समृद्ध भारत के अंशों को भी बचा कर नहीं रखा उसे दुबारा खड़ा करना तो दूर की बात. इन्ही विचारों के साथ हमने योजना बनाई है की गव्यसिद्धों का नया समूह भारत के पोरानिक विधाओं को खोजेगा, आज के भूगोल और मोसम के हिसाब से उसमें बदलाव करेगा और फिर से भारत को खड़ा करेगा.
बाईसवीं सदी का भारत, सम्पूर्ण निरोगी भारत, स्वावलंबी भारत, स्वाभिमानी और समृद्ध भारत, जो कल फिर से विश्वगुरु होगा. पूरी दुनिया को फिर से तक्षशिला और नालंदा विश्वविद्यालय के समय की भांति निरोगी, स्वावलंबी और समृदधता का पाठ पढ़ायेगा.