विकेन्द्रित उत्पादन बनाएगा समृद्ध और निरोगी भारत

हमारे सोर्यमंडल का निर्माण सूर्य नामक तारे के टूट कर बिखर जाने से हुआ है. बिखरा हुआ सारा क्षेत्र सोर्यमंडल कहलाता है. हमारी धरती उसी का एक खंड है. धरती को चलायमान रखने में सूर्य की ही उर्जा लगाती है. सूर्य नारायण से निकालने वाली दो प्रकार की उर्जायें 1) दृश्यवाली 2) अदृश्य वाली से ही हमारी पृथ्वी गतिमान है. गति के कारन पृथ्वी टिकी हुई है. जिस पर 84 लाख प्रकार के जीव - जंतु रहते आये हैं. सभी जीवों का शरीर पृथ्वी के शरीर के अंशों से ही बना है. और अंतत: सूर्य के अंश से ही बना है.
यहाँ पर हमारी समझ यह बिठाने की है की हम पृथ्वी के जिस अंश पर पैदा होते हैं हमारा शरीर पृथ्वी के उसी भूखंड के तत्वों से निर्मित होता है. अर्थात हमारे शरीर का तात्विक मिश्रण (एलिमेंटल कम्पोजीशन) उसी भूखंड के तात्विक मिश्रण से मिलता होता है. यही कारन है की हम जिस भूखंड पर पैदा होते हैं हमारा शरीर उसी भूखंड के अनुरुप होता है.
उदहारण से समझा जा सकता है – तिब्बत या पठारी चीन में पैदा लेने वाले लोगों के नाक चपटे होते हैं या नासिका छिद्र छोटे होते हैं. कारन, वहां वायु का घनत्व कम है. मोटे छिद्र वाली नासिका से श्वांस लेना कठिन है. शरीर की ऐसी बनावट वहां के स्थानीये भूगोल के कारन है. अत: उस भूगोल में रहने वाले लोगों के शरीर की आवश्यकता वहां के भूगोल में उत्पन्न वस्तु से ही पूरी की जा सकती है.
हमारे शरीर की आवश्यकता हमारे गांव या अधिक से अधिक हमारे जिला की मिट्टी में उपजे हुए अनाज, फल, फूल और औषध की है. अन्य स्थानों के उत्पाद हमारे शरीर के तात्विक मिश्रण के साथ ठीक से मिल नहीं सकते. इसे हम इस प्रकार भी कह सकते हैं की ठीक से पचा नहीं सकते. हमारे पेट में ठीक से उन वस्तुवों का विघटन नहीं हो सकता.
यही कारन है की हमारे ऋषियों ने ऐसे भारत का निर्माण किया था जो पूरी तरह से विकेन्द्रित था. गांव की उत्पादित वस्तु उसी गांव के हाट में बिकती और जो बच जाता उसे पास के शहर में खपा दिया जाता था. इससे एक और फायदा था की यातायात के खर्चे नहीं थे. वस्तु को बिना कारन ढोने की जरुरत नहीं पड़ती थी. आज वस्तुवों की कीमत यातायात के कारन दोगुनी हो जाती है.
इसीलिए "गव्यहाट" ने विकेन्द्रित उत्पादन के साथ – साथ विकेन्द्रित बाजार की व्यवस्थता की है. ताकि भारत के लोगों को अपने जिले की मिट्टी की उत्पादित वस्तु मिल सके. व्यक्ति – व्यक्ति अपने गांव की मिट्टी से जुड़ सके. तभी व्यक्ति में अपने गांव के प्रति, जिला के प्रति, राज्य के प्रति और अंत में राष्ट्र के प्रति प्रेम उत्पन्न होता है. वह अपनी मिट्टी के लिए मरने को तैयार हो जाता है. कल का भारत ऐसा ही था. आज का भारत कहीं और की मिट्टी में उपजे हुए अनाज, फल, फूल और औषध का सेवन कर अपनी मिट्टी के साथ समर्पण और प्रेम को खो दिया है. साथ ही उन वस्तुओं का विघटन ठीक से नहीं होने के कारन बीमार भी है. औषधियां ठीक से असर नहीं करती. परिणाम आज का 95 फीसदी भारत बीमार है. दुनिया के दुसरे देशों की दुर्गति भी ऐसी ही है.
इसलिए हे भारत राष्ट्र के युवा ! जगो, उठो और चल पड़ो अपने राष्ट्र के ऋषियों के दिए हुए मार्ग पर. तभी हम अपनी मिट्टी की ऋण को चुकाते हुए एक स्वर्णिम भारत का निर्माण फिर से कर सकते हैं.